पुरुषोत्तम मास में दिव्य दुग्धाभिषेक, संतों ने सुनाई भगवान की भक्त-रक्षा और श्रीकृष्ण जन्म पूर्व की प्रेरक कथाएं
पुरुषोत्तम मास में दिव्य दुग्धाभिषेक, संतों ने सुनाई भगवान की भक्त-रक्षा और श्रीकृष्ण जन्म पूर्व की प्रेरक कथाएं
20वें दिन भी लक्ष्मीनारायण देव व हरिकृष्ण महाराज पर हुई दूध की अविरल धारा, श्रद्धालुओं में उमड़ा भक्ति का उत्साह
बुरहानपुर। पवित्र पुरुषोत्तम मास के अवसर पर बुरहानपुर स्थित स्वामीनारायण मंदिर में भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक उत्साह का वातावरण बना हुआ है।
मंदिर में लगातार 20वें दिन भगवान लक्ष्मीनारायण देव एवं हरिकृष्ण महाराज का दिव्य दुग्धाभिषेक संपन्न हुआ। अभिषेक के दौरान भगवान पर दूध की अविरल धारा प्रवाहित की गई। इसके साथ ही केसर, पंचामृत, हल्दी और नारियल जल से वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अभिषेक कर श्रद्धालुओं ने भगवान के दिव्य स्वरूप के दर्शन किए।
मंदिर परिसर में संतों के सान्निध्य में भजन-कीर्तन और आरती का आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति की।
भगवान सदैव अपने भक्तों और संतों की रक्षा करते हैं : कोठारी महंत पी.पी स्वामी
अभिषेक के पश्चात आयोजित धर्मसभा में मंदिर के कोठारी महंत पी. पी स्वामी ने भगवान स्वामीनारायण के समय की एक प्रेरणादायी घटना का वर्णन करते हुए कहा कि बुरहानपुर की भूमि भगवान और संतों की तपस्या एवं भक्ति से पावन रही है। उन्होंने बताया कि जब बुरहानपुर में संतों को तत्कालीन शासकों और सैनिकों द्वारा प्रताड़ित किया जाता था तथा संत मंडल पर अत्याचार किए जाते थे, तब भगवान स्वामीनारायण ने अपने संतों की रक्षा के लिए विशेष कृपा की,उन्होंने कहा कि भगवान ने संतों को यह अनुभूति कराई कि धर्म और भक्ति के मार्ग पर चलने वालों की रक्षा स्वयं परमात्मा करते हैं। भगवान स्वामीनारायण ने कृपानंद स्वामी और अन्य संतों को बुरहानपुर भेजकर यहां सत्संग की स्थापना की और हर परिस्थिति में भक्तों तथा संतों की रक्षा का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आज भी स्वामीनारायण परंपरा में उन दिव्य प्रसंगों के संकेत और स्मृतियां श्रद्धालुओं को भगवान की करुणा एवं संरक्षण का अनुभव कराती हैं,उनहोने कहा कि उस समय भगवान ने अत्याचार से बचने के लिए कृपानंदन स्वामी को 1 लकड़ी ऐसी दी थी, जो अत्याचार से बचने के लिए उस लकड़ी को अडा दे ताकी उसे कुछ समय के लिए समाधि लगे और यमलोक की यात्रा हो जहां यमदूत कोडेमारकर उसे कष्ट की अनुभूति कराते और 1 अन्य लकड़ी से उसे समाधि से वापस लाते इस प्रकार अत्याचार से बचाते थे।
मीडिया प्रभारी गोपाल देवकर ने बताया कि धर्मसभा में व्यासपीठ से कथा का रसपान कराते हुए शास्त्री चिंतनप्रियदासजी स्वामी ने श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध की कथा का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण के अवतार से पूर्व अत्याचारी कंस ने अपनी बहन देवकी और वासुदेव को कारागार में बंद कर रखा था तथा आकाशवाणी के भय से उनके पुत्रों का वध कर देता था।
उन्होंने कहा कि वासुदेवजी ने अपनी बुद्धिमत्ता और धैर्य का परिचय देते हुए कंस को आश्वस्त किया कि उनके यहां जन्म लेने वाली प्रत्येक संतान को वह उसके हवाले कर देंगे। इसी कारण कंस ने तत्काल देवकी का वध करने का विचार त्याग दिया। किंतु बाद में भय और अहंकार के वशीभूत होकर उसने देवकी के छह पुत्रों का वध कर दिया।
भगवान जन्म नहीं लेते, अवतार धारण करते हैं
शास्त्री चिंतनप्रियदासजी स्वामी ने कहा कि भगवान सामान्य जीवों की तरह जन्म नहीं लेते, बल्कि धर्म की स्थापना, भक्तों की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए दिव्य अवतार धारण करते हैं। उन्होंने गीता के प्रसिद्ध श्लोक "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत..." का उल्लेख करते हुए बताया कि जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान विभिन्न रूपों में अवतरित होकर संसार का कल्याण करते हैं।
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