साहित्य को नई उड़ान: ताप्ती सृजन पीठ में गूंजा ग़ज़ल का जादू, ‘आसमान से ऊँची उड़ान’ का भव्य लोकार्पण।ग़ज़लकार राजपाल सिंह चावला ‘राज’ के सम्मान में हुआ ताप्ती ग़ज़ल अलंकरण 2026,
शब्दों ने छुआ आसमान: ताप्ती सृजन पीठ में ग़ज़ल का महाकुंभ, ‘आसमान से ऊँची उड़ान’ का ऐतिहासिक लोकार्पण
बुरहानपुर की साहित्यिक फिज़ा उस समय भावनाओं और अल्फ़ाज़ों से महक उठी, जब ताप्ती सृजन पीठ में ग़ज़ल की एक यादगार महफ़िल सजी। अवसर था प्रख्यात ग़ज़लकार राजपाल सिंह चावला ‘राज’ के ग़ज़ल संग्रह “आसमान से ऊँची उड़ान” के भव्य लोकार्पण का, जिसने सभागार को साहित्य प्रेमियों से खचाखच भर दिया।
कार्यक्रम का सबसे भावपूर्ण क्षण तब आया, जब राजपाल सिंह ‘राज’ को उनके उल्लेखनीय साहित्यिक योगदान के लिए “ताप्ती ग़ज़ल अलंकरण 2026” से सम्मानित किया गया। विमोचन एवं अलंकरण समारोह के दौरान ग़ज़ल की संवेदनशीलता, सामाजिक सरोकार और भावनात्मक गहराइयों पर गंभीर विमर्श हुआ। मंच से गूंजे शेर-ओ-शायरी के अल्फ़ाज़ों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया और तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा सभागार गूंज उठा।
इस गरिमामय आयोजन में मुख्य अतिथि गोविंद शर्मा (वन माली सृजन पीठ अध्यक्ष, खंडवा) रहे। विशेष अतिथि साहूर आसना (ग़ज़लकार व शायर), संतोष देवताले (वरिष्ठ अधिवक्ता), रमेश चंद्र शर्मा ‘धुंआधार’ (कवि), भूपेंद्र सिंह खंडपूरे (पूर्व रोटरी क्लब अध्यक्ष, खंडवा), संतोष परिहार और डॉ. मनोज अग्रवाल ने कृति की समीक्षात्मक सराहना की। वक्ताओं ने कहा कि ‘राज’ की ग़ज़लें संवेदना और समकालीन यथार्थ की सशक्त अभिव्यक्ति हैं।
ताप्ती सृजन पीठ से उठी यह साहित्यिक उड़ान सचमुच आसमान से भी ऊँची नज़र आई।
साहित्य को नई उड़ान: ताप्ती सृजन पीठ में गूंजा ग़ज़ल का जादू, ‘आसमान से ऊँची उड़ान’ का भव्य लोकार्पण।
ग़ज़लकार राजपाल सिंह चावला ‘राज’ के सम्मान में हुआ ताप्ती ग़ज़ल अलंकरण 2026, साहित्य प्रेमियों से खचाखच भरा सभागार।
बुरहानपुर,साहित्य और संस्कृति को समर्पित ताप्ती सृजन पीठ, बुरहानपुर में शब्दों की अद्भुत महफ़िल सजी, जहां ग़ज़ल प्रेमियों को मिला एक यादगार साहित्यिक उत्सव। अवसर था ग़ज़ल संग्रह “आसमान से ऊँची उड़ान” के भव्य पुस्तक लोकार्पण का।
कार्यक्रम के केंद्र में रहे प्रख्यात ग़ज़लकार राजपाल सिंह चावला ‘राज’, जिनके साहित्यिक योगदान को सम्मान देते हुए “ताप्ती ग़ज़ल अलंकरण 2026” प्रदान किया गया।
इस दौरान विमर्श एवं अलंकरण समारोह में साहित्यकारों, कवियों और बुद्धिजीवियों ने ग़ज़ल की गहराई, संवेदनशीलता और सामाजिक सरोकारों पर सारगर्भित चर्चा की।
मंच से गूंजे शेर-ओ-शायरी के अल्फ़ाज़, तो श्रोताओं ने तालियों से किया हर एहसास का स्वागत। कार्यक्रम ने यह साबित कर दिया कि आज भी साहित्य समाज की आत्मा की आवाज़ है।
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