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बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे ग्रामीण, मिट्टी से छान निकाल रहे पीने का पानी

  


बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे ग्रामीण, मिट्टी से छान निकाल रहे पीने का पानी


  •  पानी की समस्या को लेकर सड़क पर बैठे ग्रामीण,


  • गंदे पानी को उबालकर और कपड़े से छानकर पीने को हैं मजबूर.


  • दूषित पानी को उबालकर और कपड़े से छानकर पीते हैं ग्रामीण


नैनपुर : कजरवाड़ा पंचायत के पोषक ग्राम सिमरिया में ग्रामीण गंदे नाले जैसा पानी पीने को मजबूर हैं. आदिवासी बहुल यह गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है. गांव के लोग बताते हैं कि पीने के पानी की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है. पूरे गांव को करीब 2 किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ता है. वह पानी भी साफ नहीं, बल्कि दूषित और बदबूदार होता है. ग्रामीण मजबूरी में उसी पानी को उबालकर और कपड़े से छानकर पीते हैं, ताकि किसी तरह जीवन-यापन चल सके.

बर्तनों में गंदा पानी लेकर बीच सड़क पर बैठे ग्रामीण


सिमरिया गांव के लगभग सभी लोग पूरी तरह मजदूरी पर आश्रित है. दिनभर मेहनत करने के बाद शाम को पानी के लिए संघर्ष करना पड़ता है. बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे, सभी इस परेशानी को झेल रहे हैं. जिसको लेकर गुरुवार को सड़क जाम कर दी. इस दौरान ग्रामीण अपने बर्तनों में गंदे पानी लेकर सड़क के बीचों-बीच बैठ गए.

पानी की समस्या को लेकर सड़क पर बैठे ग्रामीण

लोगों के घरों तक पाइप पहुंचा लेकिन पानी नहीं

प्रदर्शनकारियों ने बताया कि "हम लोग रोज दूर से पानी लाते हैं. पानी गंदा रहता है, जिससे बच्चे बीमार पड़ जाते हैं. इस बारे में कलेक्टर को भी बताया, मंत्री को भी ज्ञापन दिया, लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई. गांव के पास में ही 4 साल से पानी की टंकी बनकर तैयार है, लोगों के घरों तक पाइप बिछी है, लेकिन पानी एक बूंद भी आज तक नहीं आया है. हालत ये है कि अब तो पानी की टंकी भी जर्जर होते जा रही है.

मुर्गा टोला में की जा रही पानी की व्यवस्था

नैनपुर की तहसीलदार पूजा राणा मौके पर पहुंची और ग्रामीणों से चर्चा की. उन्होंने बताया कि "नैनपुर विकास खण्ड के ग्राम पंचायत सिमरिया में ग्रामीणों ने वर्षों से पानी की समस्या बनी हुई है. उसके लिए राजस्व अमला की तरफ से में उपस्थित हुई हूं. यहां लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग का अमला भी मौजूद है. यहां पीएचई विभाग के द्वारा बोर किया गया, लेकिन ग्राउंड वाटर कम होने के कारण पानी नहीं मिला. कुछ दूरी पर मुर्गा टोला है, वहां से सिमरिया पानी लाने की व्यवस्था बनाई जा रही है."

सवाल वही—प्यास कब बुझेगी?

सवाल यह है कि

जब टंकी बनी, पाइप बिछे, फिर पानी क्यों नहीं?

कब तक ग्रामीण गंदा पानी पीकर जान जोखिम में डालते रहेंगे?

क्या प्रशासन की नींद तभी खुलेगी जब कोई बड़ी अनहोनी हो जाएगी?

सिमरिया गांव की यह तस्वीर सिस्टम के खोखले दावों पर करारा तमाचा है।

अब देखना होगा कि यह आंदोलन सिर्फ खबर बनकर रह जाता है, या सच में ग्रामीणों की प्यास बुझाने का रास्ता खोलता है। 


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