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लंदन की चकाचौंध छोड़ नर्मदा की शरण में दो विदेशी मेहमान

 

लंदन की चकाचौंध छोड़ नर्मदा की शरण में दो विदेशी मेहमान 

  • सात समंदर पार से खींच लाई मैया की भक्ति, पैदल कर रहे परिक्रमा
  • नर्मदे हर के जयकारों के साथ बढ़ रहे विदेशी कदम
  • 62 साल के गाय डेन और जैक हुए भारतीय संस्कृति के कायल
  • सात समंदर पार लंदन से आए परिक्रमावासी

मंडला . कहते हैं माँ नर्मदा की महिमा निराली है, जिसकी गूंज अब सात समंदर पार इंग्लैंड तक जा पहुँची है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण इन दिनों मंडला जिले के निवास क्षेत्र में देखने को मिला, जहाँ लंदन के रहने वाले 62 वर्षीय गाय डेन और उनके 26 वर्षीय युवा साथी जैक एक सच्चे साधक की तरह पैदल माँ नर्मदा की परिक्रमा कर रहे हैं। कंधे पर झोला टांगे और जुबां पर नर्मदे हर का अभिवादन लिए जब ये विदेशी मेहमान निवास के ग्राम गुंदलई पहुँचे, तो स्थानीय नागरिक उन्हें देख दंग रह गए।

1976 से भारत से नाता, अब माँ नर्मदा को कह रहे धन्यवाद 

इंग्लैंड से आए गाय डेन के लिए भारत नया नहीं है। वे पहली बार 1976 में महज 18 साल की उम्र में यहाँ आए थे। यह उनका सातवां भारत दौरा है, लेकिन इस बार का मकसद पूरी तरह आध्यात्मिक है। चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि मैं यहाँ सिर्फ माँ नर्मदा को धन्यवाद देने आया हूँ। इंग्लैंड का जीवन यहाँ से बिल्कुल अलग है। यहाँ ग्रामीण भारत की सादगी और लोगों की उदारता देखकर मैं भावुक हूँ। मेरा संदेश है कि माँ नर्मदा की सेवा करें और उनका आशीर्वाद लें।

युवा जैक के लिए प्रेम ही है मुख्य उद्देश्य 

पवहीं गाय डेन के साथ चल रहे जैक 26 वर्ष के लिए यह अनुभव बिल्कुल नया और जीवन का सबसे गहरा अनुभव है। जैक अपने अंकल गाय डेन से प्रेरणा पाकर इस यात्रा पर निकले हैं। जहाँ आज की युवा पीढ़ी तकनीक में खोई है, वहीं जैक आश्रमों के सादा भोजन और ग्रामीण शांति में सुकून ढूँढ रहे हैं। जैक का कहना है कि यह यात्रा शारीरिक रूप से कठिन जरूर है, लेकिन मानसिक रूप से बहुत संतोषजनक है।

3500 किमी का लिया संकल्प 

गुजरात से शुरू हुआ सफर इन विदेशी पदयात्रियों ने अपनी परिक्रमा लगभग 50 दिन पूर्व गुजरात के मीठी तलाई से शुरू की थी। अब तक वे करीब 1000 किलोमीटर का सफर तय कर चुके हैं। प्रतिदिन 20 से 25 किलोमीटर पैदल चलने वाले इन यात्रियों के पैरों में भले ही छाले हों, लेकिन चेहरे पर थकान के बजाय आत्मिक सुकून नजर आता है।

ग्राम गुंदलई में हुआ भव्य स्वागत 

निवास-बरेला मार्ग से गुजरते समय जब स्थानीय नागरिकों की नजर इन पर पड़ी तो समाजसेवी राधे लाल यादव, अंकित यादव और रोहित प्रशांत चौकसे ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। स्थानीय लोगों ने उनके लिए विशेष व्यवस्थाएं भी कीं। विदेशी मेहमानों ने बताया कि भाषा अलग होने के बावजूद यहाँ के लोगों के सेवा भाव ने उनके दिल के तार जोड़ दिए हैं। बताया गया कि अमरकंटक से होकर वापस वहीं समाप्त होने वाली इस 3500 किलोमीटर की कठिन यात्रा पर अडिग ये दोनों सैलानी आज हर किसी के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं।



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