नैनपुर की नहरें मौत के मुहाने पर, ‘हर खेत को पानी’ बना खोखला दावा
नैनपुर की नहरें मौत के मुहाने पर, ‘हर खेत को पानी’ बना खोखला दावा
- कागजों में बह रही योजनाएँ, हकीकत में सूख रहे नैनपुर के खेत
- गाद, झाड़ियाँ और लापरवाही: नैनपुर में दम तोड़ती सिंचाई व्यवस्था
- नैनपुर की नहरें मौत के मुहाने पर, ‘हर खेत को पानी’ बना खोखला दावा
- कागजों में बह रही योजनाएँ, हकीकत में सूख रहे नैनपुर के खेत
- गाद, झाड़ियाँ और लापरवाही: नैनपुर में दम तोड़ती सिंचाई व्यवस्थानैनपुर में सिस्टम फेल: नहरें बनीं कूड़ादान
- खेत प्यासे – कागजों में बह रहा ‘हर खेत को पानी’
नैनपुर।
मध्यप्रदेश सरकार भले ही “हर खेत को पानी” का दावा कर रही हो, लेकिन नैनपुर क्षेत्र की हकीकत इन दावों को आइना दिखा रही है। यहाँ सिंचाई विभाग की लापरवाही ने जीवनरेखा मानी जाने वाली नहरों को दम तोड़ने पर मजबूर कर दिया है। मुख्य नहरों से लेकर माइनर नहरें तक आज गाद, झाड़ियों और कचरे में दब चुकी हैं। नतीजा यह है कि टेल एंड पर बसे गाँवों तक पानी पहुँचना लगभग असंभव हो गया है और किसान सूखे खेतों के साथ सरकार से जवाब मांग रहे हैं।
सालों से सफाई न होने के कारण नहरों की तलहटी में भारी सिल्ट जमा हो चुकी है। कई स्थानों पर झाड़ियाँ और खरपतवार पानी के बहाव को पूरी तरह रोक रहे हैं। जगह-जगह नहरों की पटरियाँ टूट चुकी हैं, जिससे कभी भी नहर फूटने और फसलों के डूबने का खतरा बना रहता है। हालात इतने बदतर हैं कि नहरें अब सिंचाई का साधन नहीं, बल्कि कूड़ादान का रूप ले चुकी हैं।
किसानों का दर्द, बढ़ती लागत
नहरों में पानी होने के बावजूद खेतों तक न पहुँचने से किसान बुरी तरह परेशान हैं। स्थानीय किसान अवनीश ठाकुर कहते हैं—
“विभाग सिर्फ कागजों में सफाई दिखाता है। ज़मीन पर कुछ नहीं होता। मजबूरी में हमें निजी ट्यूबवेल चलाने पड़ रहे हैं, जिससे खेती की लागत दोगुनी हो गई है।”
अन्य किसानों का आरोप है कि अधिकारी सिर्फ मॉनसून में, जब बाढ़ का खतरा बनता है, तभी हरकत में आते हैं। सालभर नहरों की सुध नहीं ली जाती।
हर बार वही बहाना
जब इस मुद्दे पर सिंचाई विभाग के जिम्मेदारों से बात की गई, तो जवाब हमेशा की तरह वही रहा—“बजट की कमी।” अधिकारियों ने रोस्टर के अनुसार सफाई कार्य प्रस्तावित होने और जल्द विशेष अभियान चलाने का आश्वासन दिया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये आश्वासन भी कागजों तक ही सीमित रहेंगे?
नहरों पर कब्जे, बहाव पूरी तरह बाधित
समस्या को और गंभीर बना रहा है नहरों के दोनों किनारों पर किया गया अतिक्रमण। कई स्थानों पर लोगों ने नहर की पटरियों तक घर और दुकानें बना ली हैं। कहीं नालियों का पानी नहर में छोड़ा जा रहा है, तो कहीं कचरा डालकर उसे पाटने का प्रयास किया गया है। अतिक्रमण के कारण नहरों की चौड़ाई सिमटती जा रही है और सफाई कार्य भी प्रभावित हो रहा है। किसानों का कहना है कि जब तक नहरों से कब्जे नहीं हटाए जाएंगे और पटरियों को मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक अंतिम छोर तक पानी पहुँचाना सिर्फ कागजी दावा ही बना रहेगा।
इसे आप “हालात इतने बदतर हैं कि नहरें अब सिंचाई का साधन नहीं, बल्कि कूड़ादान का रूप ले चुकी हैं।” वाले पैराग्राफ के बाद जोड़ सकते हैं, जिससे खबर और अधिक धारदार व ज़मीनी हकीकत से जुड़ी हुई लगेगी।
नैनपुर के किसान अब पूछ रहे हैं—
अगर नहरें ही दम तोड़ दें, तो “हर खेत को पानी” का सपना आखिर कैसे पूरा होगा?
जब तक जमीनी स्तर पर सफाई और मरम्मत नहीं होगी, तब तक यह योजना किसानों के लिए सिर्फ एक नारा बनकर ही रह गयी हे
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