सिद्धेश्वर धाम में गणेश पुराण की गूंज, भक्ति के साथ गूंजी शौर्यगाथा
सिद्धेश्वर धाम में गणेश पुराण की गूंज, भक्ति के साथ गूंजी शौर्यगाथा
- पंडित ललित नारायण मिश्रा ने सुनाया मधु-कैटभ वध का प्रसंग
- गोरा-बादल के बलिदान से जागी राष्ट्रभक्ति
मंडला- सुरंगदेवरी स्थित प्रसिद्ध आध्यात्मिक केंद्र श्री सिद्धेश्वर धाम में इन दिनों श्री गणेश पुराण का संगीतमय वाचन किया जा रहा है। सुप्रसिद्ध कथावाचक पंडित ललित नारायण मिश्रा की सुमधुर वाणी से बह रही ज्ञान गंगा का लाभ लेने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ रहे हैं। कथा के दौरान पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर नजर आया।
- पंडित ललित नारायण मिश्रा ने कथा में आध्यात्म के साथ भारत की गौरवशाली शौर्य गाथाओं को भी जोड़ा। उन्होंने वीर योद्धा गोरा-बादल के अद्वितीय साहस का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि किस प्रकार धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए इन वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी। श्रोता उस समय भाव-विभोर हो गए जब महाराज श्री ने बताया कि गोरा-बादल का सिर कटने के बाद भी वे एक पहर तक शत्रुओं से लड़ते रहे। उन्होंने जोर देकर कहा कि नई पीढ़ी को धर्म के साथ-साथ वीरता के इन प्रसंगों से परिचित कराना आवश्यक है।
श्री गणेश पुराण में आगे मधु-कैटभ और भगवान गणेश की महिमा बताई। पंडित ललित नारायण ने कथा का वाचन करते हुए बताया कि क्यों माता दुर्गा की आरती में उन्हें मधु-कैटभ को मारने वाला कहा जाता है, जबकि उन्हें भगवान विष्णु ने मारा था। इसके साथ ही ब्रह्मा जी को मधु-कैटभ के आतंक से बचाने के लिए भगवान गणेश की शक्ति का आह्वान और विष्णु जी द्वारा की गई गणेश पूजा के रहस्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया।
मधु कैटभ की कथा में आगे बताया कि गणेश पुराण और मार्कंडेय पुराण के अनुसार मधु और कैटभ दो अत्यंत शक्तिशाली राक्षस थे, जिनकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के कान के मैल से हुई थी। जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में थे, तब उनके कानों के मैल से ये दो असुर उत्पन्न हुए। इन्होंने कठोर तपस्या कर देवी से यह वरदान प्राप्त कर लिया कि उनकी मृत्यु केवल उनकी इच्छा से ही होगी। इन असुरों ने कमल के पुष्प पर विराजमान ब्रह्मा जी को मारने का प्रयास किया। ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु को जगाने के लिए देवी की स्तुति की। जागने के बाद भगवान विष्णु का इन असुरों से 5000 वर्षों तक युद्ध चला, लेकिन वरदान के कारण वे नहीं हार रहे थे। तब भगवान विष्णु ने आदि-शक्ति और विघ्नहर्ता श्री गणेश की आराधना की।
पंडित ललित नारायण मिश्रा ने आगे बताया कि अंतत: देवी ने असुरों की बुद्धि भ्रमित की। असुरों ने प्रसन्न होकर विष्णु जी से कहा हम तुम्हारी वीरता से खुश हैं, वर मांगो। विष्णु जी ने चतुराई से मांगा मुझे तुम्हारा वध करने का अवसर दो। चूँकि चारों ओर जल था, असुरों ने शर्त रखी कि हमें वहां मारो जहां जल न हो। तब भगवान विष्णु ने उन्हें अपनी जांघ जो सूखी थी वहां रखकर उनका वध किया। उन्होंने आगे बताया कि दुर्गा जी की आरती में मधु कैटभ दुई मारे इसलिए कहा जाता है क्योंकि आदिशक्ति ने ही असुरों की बुद्धि को मोह लिया था और भगवान विष्णु को शक्ति प्रदान की थी। शक्ति के बिना वध संभव नहीं था, इसलिए इसका श्रेय माता दुर्गा को दिया जाता है।
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