अर्चना चिटनिस ने बढ़ाया महिलाओं का उत्साह-केले के रेशे से बनी पर्यावरण-अनुकूल राखियां बन रहीं आत्मनिर्भर बुरहानपुर की नई पहचान।
अर्चना चिटनिस ने बढ़ाया महिलाओं का उत्साह-केले के रेशे से बनी पर्यावरण-अनुकूल राखियां बन रहीं आत्मनिर्भर बुरहानपुर की नई पहचान।
बुरहानपुर। केले के उत्पादन के लिए देशभर में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाला बुरहानपुर अब केले के रेशे (फाइबर) से तैयार हो रहे मूल्यवर्धित उत्पादों के माध्यम से महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहा है। ‘‘एक जिला-एक उत्पाद‘‘ योजना के अंतर्गत केले को मिली पहचान अब रोजगार और स्वरोजगार का नया आधार बन रही है। रक्षाबंधन के पावन पर्व पर जिले की महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा केले के रेशे से शुद्ध, हस्तनिर्मित एवं पूर्णतः पर्यावरण-अनुकूल राखियां तैयार की जा रही हैं। यह पहल प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘‘वोकल फॉर लोकल‘‘, ‘‘लोकल फॉर ग्लोबल‘‘ के आह्वान तथा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश के संकल्प को धरातल पर साकार करती दिखाई दे रही है।
इसी क्रम में विधायक एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनिस (दीदी) से ग्राम जैनाबाद के श्रीकृष्ण स्वयं सहायता समूह की श्रीमती पूजा कुशवाह तथा शाहपुर निवासी श्रीमती उषा उदलकर ने भेंट कर केले के रेशे से तैयार की जा रही राखियों एवं अन्य उत्पादों की जानकारी दी। महिलाओं ने उन्हें हस्तनिर्मित राखियां भी भेंट कीं तथा अपने स्वरोजगार की यात्रा साझा की।
श्रीमती पूजा कुशवाह ने बताया कि श्रीकृष्ण स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने केले के रेशे से उत्पाद बनाने का कार्य छोटे स्तर से प्रारंभ किया था। निरंतर प्रयास, नवाचार और आत्मविश्वास के बल पर आज यह पहल 40 से अधिक महिलाओं के लिए रोजगार का सशक्त माध्यम बन चुकी है। समूह द्वारा केले के रेशे से झूले, मोबाइल कवर, झूमर, पेन होल्डर, भगवान गणेश की प्रतिमाएं, सजावटी सामग्री सहित अनेक आकर्षक एवं उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। आगामी रक्षाबंधन को ध्यान में रखते हुए विशेष रूप से प्राकृतिक राखियों का निर्माण किया गया है।
श्रीमती उषा उदलकर ने बताया कि उनके समूह द्वारा बनाई जा रही राखियां पूरी तरह शुद्ध एवं पर्यावरण-अनुकूल हैं। इनमें किसी भी प्रकार के रासायनिक रंग, प्लास्टिक या पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री का उपयोग नहीं किया जाता। केले के रेशे से तैयार यह राखियां प्राकृतिक सौंदर्य, भारतीय संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती हैं। उन्होंने बताया कि राखियों की कीमत 15 से 25 रुपए तक की रखी गई है, जिससे प्रत्येक परिवार आसानी से इन्हें खरीद सके। लोगों में इन प्राकृतिक राखियों के प्रति लगातार उत्साह बढ़ रहा है और मांग भी तेजी से बढ़ रही है, जिससे महिलाओं की आय एवं आत्मविश्वास दोनों में वृद्धि हो रही है।
महिलाओं के इस अभिनव प्रयास की सराहना करते हुए श्रीमती अर्चना चिटनिस ने कहा कि बुरहानपुर का केला केवल कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि जिले की पहचान है। अब इसी केले के रेशे से तैयार होने वाले मूल्यवर्धित उत्पाद किसानों, महिलाओं और स्थानीय उद्यमिता को जोड़ने वाली एक मजबूत आर्थिक श्रृंखला का निर्माण कर रहे हैं। इससे कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा, महिलाओं के लिए स्वरोजगार के नए अवसर बढ़ेंगे और जिले की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी। उन्होंने कहा कि स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर तैयार किए गए उत्पाद ही विकसित भारत की मजबूत नींव हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया ‘‘वोकल फॉर लोकल‘‘ का मंत्र तभी सार्थक होगा, जब हम स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देंगे। बुरहानपुर की महिलाएं अपने कौशल और परिश्रम से इस अभियान को जन-आंदोलन का स्वरूप दे रही हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में महिला स्व-सहायता समूहों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रदेश सरकार लगातार कार्य कर रही है और बुरहानपुर की महिलाएं इस दिशा में प्रेरणादायी भूमिका निभा रही हैं।
श्रीमती चिटनिस ने कहा कि भारतीय संस्कृति में केले के वृक्ष और उसके पत्तों का विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व है। पूजा-अर्चना, मांगलिक कार्यों और शुभ अवसरों पर केले के वृक्ष एवं पत्तों का उपयोग शुभता, समृद्धि और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में केले के रेशे से बनी राखियां हमें प्रकृति, संस्कृति और भारतीय परंपराओं से जोड़ने का कार्य करती हैं। उन्होंने कहा कि महाभारत में द्रौपदी द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की उंगली पर बांधा गया रक्षा सूत्र केवल एक धागा नहीं था, बल्कि प्रेम, विश्वास और संरक्षण का प्रतीक था। उसी स्नेह का ऋण भगवान श्रीकृष्ण ने जीवनभर निभाया। रक्षाबंधन का यही पवित्र भाव आज भी भाई-बहन के अटूट रिश्ते की आधारशिला है। केले के रेशे से बनी यह प्राकृतिक राखियां उस स्नेह के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश भी देती हैं।
श्रीमती अर्चना चिटनिस ने नागरिकों से भावनात्मक अपील करते हुए कहा कि इस रक्षाबंधन पर अधिक से अधिक लोग महिलाओं द्वारा अपने हाथों से तैयार की गई केले के रेशे की राखियां खरीदें। प्रत्येक खरीदी गई राखी केवल भाई-बहन के प्रेम और विश्वास का प्रतीक नहीं होगी, बल्कि किसी महिला के आत्मसम्मान, उसके परिवार की खुशहाली, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान देगी। उन्होंने कहा कि बुरहानपुर की महिलाएं यह सिद्ध कर रही हैं कि यदि स्थानीय संसाधनों को नवाचार, कौशल और आत्मविश्वास के साथ जोड़ा जाए तो वे राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान बना सकते हैं। केले के रेशे से बनी ये शुद्ध एवं पर्यावरण-अनुकूल राखियां केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी भावना, स्थानीय उद्यमिता और आत्मनिर्भर भारत की जीवंत एवं प्रेरणादायी मिसाल हैं।
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