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200 वर्ष प्राचीन स्वामीनारायण मंदिर में पुरुषोत्तम मास की भक्ति, 6 किलो सोने के सिंहासन पर विराजते हैं लक्ष्मीनारायण देव

 बुरहानपुर

200 वर्ष प्राचीन स्वामीनारायण मंदिर में पुरुषोत्तम मास की भक्ति, 6 किलो सोने के सिंहासन पर विराजते हैं लक्ष्मीनारायण देव

बुरहानपुर का 200 वर्ष प्राचीन Swaminarayan Temple Burhanpur इन दिनों पुरुषोत्तम मास के दौरान अद्भुत भक्ति, साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बना हुआ है। देशभर से श्रद्धालु भगवान के दर्शन, दुग्ध अभिषेक और कथा-श्रवण के लिए यहां पहुंच रहे हैं। मंदिर परिसर में सुबह से देर रात तक भजन, पूजन और धर्मसभा का वातावरण बना हुआ है


बुरहानपुर स्वामीनारायण मंदिर के महंत कोठारी पी पी स्वामी ने कहा कि
इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां लगभग 6 किलो सोने से निर्मित तीन दिव्य सिंहासन स्थापित हैं। मध्य सिंहासन पर लक्ष्मीनारायण देव हरेकृष्ण महाराज विराजमान हैं, दाहिने सिंहासन पर भगवान स्वामीनारायण अर्थात घनश्याम महाराज विराजते हैं, जबकि बाएं सिंहासन पर भगवान की सुख सैया सजाई जाती है।

स्वामीनारायण संप्रदाय में मान्यता है कि पुरुषोत्तम मास भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय है। शास्त्रों में इसे “अधिक मास” नहीं बल्कि “पुरुषोत्तम मास” कहा गया है। मान्यता है कि इस मास में किया गया स्नान, दान, जप, तप और भक्ति अनेक गुना फल प्रदान करती है। यही कारण है कि पूरे विश्व में स्वामीनारायण संप्रदाय का यह एकमात्र मंदिर माना जाता है जहां पूरे पुरुषोत्तम मास में प्रतिदिन भगवान का विशेष दुग्ध अभिषेक किया जाता है।

 मंदिर के मीडिया प्रभारी गोपाल देवकर ने बताया कि आज आयोजित दुग्ध अभिषेक एवं पूजा-अर्चना में छपिया माझी महंत ब्रह्मचारी हृस्वरूपानंदजी, मुड़ी माझी महंत हरिप्रकाशदासजी तथा अयोध्या माझी कोठारी सर्वेश्वरदासजी जैसे पूज्य संत शामिल हुए। भगवान स्वामीनारायण की जन्मस्थली छपिया में सेवा करने वाले इन संतों का बुरहानपुर आगमन भक्तों के लिए विशेष सौभाग्य माना जा रहा है। संतों ने भगवान का दुग्ध अभिषेक, पूजा एवं आरती कर दर्शन लाभ प्राप्त किया।

व्यासपीठ से प्रवचन देते हुए Shastri Swami Chintanpriyadasji ने शास्त्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य को भगवान से कभी छल या चालाकी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि परमात्मा अंतःकरण के भाव को जानते हैं। उन्होंने कहा कि धर्मशास्त्रों में वर्णित है कि पुरुषोत्तम मास में प्रातःकाल स्नान, जप और सत्संग का अत्यंत महत्व है। इस मास में किया गया दान कभी निष्फल नहीं जाता। यदि इस जन्म में उसका फल दिखाई न दे तो अगले जन्म में अवश्य प्राप्त होता है। उसी प्रकार मनुष्य के द्वारा किए गए पाप भी व्यर्थ नहीं जाते, उनका फल भी किसी न किसी रूप में भोगना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि शास्त्रों में सत्कर्म और पुण्य को जीवन की वास्तविक पूंजी बताया गया है। जिस प्रकार मनुष्य भविष्य के लिए धन संचय करता है, उसी प्रकार भजन, सेवा, दान और पुण्य का संचय भी करना चाहिए, ताकि जीवन के अंतिम समय में आत्मा को शांति और भगवान की कृपा प्राप्त हो सके।

शास्त्री चिंतनप्रियदासजी ने कहा कि दान सदैव जरूरतमंद और दीन-दुखियों को करना चाहिए। भगवान को प्रसन्न करने के लिए केवल पूजा ही पर्याप्त नहीं, बल्कि सत्कर्म, सेवा और करुणा भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि पुरुषोत्तम मास का अपमान करने वाले को शास्त्रों में कठोर परिणाम भुगतने पड़े हैं। महाभारत और पुराणों के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने अगले प्रारब्ध को सुधारने के लिए निरंतर पुण्य और सत्कर्म रूपी झरना बहाते रहना चाहिए।

उन्होंने भक्तों से आह्वान किया कि पुरुषोत्तम मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, सेवा, संयम और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का पर्व है।

पुरुषोत्तम मास के चलते मंदिर परिसर में प्रतिदिन भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है और पूरा वातावरण भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर नजर आ रहा है, मंदिर परिसर में चल रही कथा का संचालन मंदिर के सभ्य नटवर भगत ने किया।

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