"1001 लीटर दूध से अभिषेक, 1 टन फलों का फलोत्सव""स्वामीनारायण मंदिर में उमड़ा भक्ति का सैलाब!"
अधिक मास पूर्णिमा पर स्वामीनारायण मंदिर में भक्ति का उमड़ा सैलाब, 1001 लीटर दूध से हुआ दिव्य अभिषेक,51 किलो फूलों से हुआ राजोपचार,1टन फलो से हुआ फलोत्सव,मंदिर के शिखर पर भी ध्वजारोहण किये।
बुरहानपुर: अधिक मास की पूर्णिमा के पावन अवसर पर बुरहानपुर स्थित स्वामीनारायण मंदिर में धार्मिक श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया। मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी और पूरे वातावरण में भक्तिमय उल्लास देखने को मिला।
पूर्णिमा के शुभ अवसर पर भगवान लक्ष्मीनारायण देव, हरिकृष्ण महाराज एवं घनश्याम महाराज का 1001 लीटर दूध, 5 किलो शक्कर, 3 किलो शहद, जामुन रस, गन्ने के रस, नारियल पानी सहित विभिन्न पवित्र द्रव्यों से दिव्य अभिषेक किया गया। इस महाअभिषेक में कमलेश शाह, अजय सुगंधी, विजय सुगंधी सहित अनेक हरिभक्त यजमान के रूप में सहभागी बने। अभिषेक उपरांत भगवान का 51 किलो गुलाब की पंखुड़ियों एवं नवरंग पुष्पों से भव्य राजोपचार किया गया, जिसके दिव्य दर्शन कर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
मंदिर में पूरे दिन धार्मिक उत्सव और हर्षोल्लास का वातावरण बना रहा। पुरुषोत्तम मास की पूर्णिमा के अवसर पर सैकड़ों हरिभक्तों ने वड़ताल धाम की परंपरा के अनुसार सप्तधान, नारियल एवं दक्षिणा से पूनम भरने का धार्मिक अनुष्ठान भी किया। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक पूनम भरने से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा लगातार पांच पूनम भरने पर संकल्प सिद्ध होता है।
इसके पश्चात श्रद्धालुओं ने चौका प्रसादी का आनंद लिया। भगवान के समक्ष विभिन्न प्रकार के आकर्षक फलों की सजावट कर फ़लोत्सव मनाया गया, जिसमें भक्तों ने भक्ति रस के साथ उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यासपीठ से पूज्य शास्त्री चिंतनप्रियदास जी महाराज ने श्रद्धा और भक्ति के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में बताया गया है कि यदि धन अधिक हो लेकिन श्रद्धा कम हो तो साधना का वास्तविक फल प्राप्त नहीं होता। भगवान भाव के भूखे हैं, वैभव के नहीं। सुदामा, विदुर और शबरी जैसे भक्तों के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भगवान ने उनके प्रेम और समर्पण को स्वीकार कर उन्हें अपनी कृपा का पात्र बनाया।
स्वामीश्री ने पारिवारिक संस्कारों की महत्ता बताते हुए कहा कि पिता के अक्षरवासी होने के बाद बड़े भाई को पिता तुल्य सम्मान देना चाहिए। भारतीय संस्कृति और धर्मशास्त्रों में बड़े भाई को परिवार का संरक्षक माना गया है। परिवार में आदर, प्रेम और अनुशासन बना रहे तो भगवान की कृपा भी बनी रहती है।
पुरुषोत्तम मास की महिमा का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि यह भगवान को अत्यंत प्रिय मास है। इस दौरान किए गए व्रत, जप, तप, दान और कथा-श्रवण का पुण्य अनेक गुना बढ़ जाता है। शास्त्रों में वर्णित है कि पुरुषोत्तम मास का श्रद्धापूर्वक व्रत करने से भगवान प्रसन्न होते हैं और भक्त के लिए वैकुंठ प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
कथा के दौरान उन्होंने मुग्धा चरित्र का संक्षिप्त वर्णन करते हुए बताया कि एक सरल और निष्कपट भक्त महिला ने अपनी अटूट श्रद्धा और निष्ठा से भगवान को प्रसन्न कर लिया था। उसके पास भौतिक साधन कम थे, लेकिन सच्ची भक्ति के बल पर उसे भगवान की विशेष कृपा प्राप्त हुई। यह चरित्र हमें सिखाता है कि भगवान बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि भक्त के निर्मल हृदय और निष्काम भक्ति को स्वीकार करते हैं।
स्वामीश्री ने कहा कि ऐसी पवित्र कथाओं का श्रवण और वाचन करने वाला दोनों ही पुण्य के भागी बनते हैं। कथा मनुष्य के अंतःकरण को शुद्ध कर उसे धर्म, भक्ति और सदाचार के मार्ग पर अग्रसर करती है।
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