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ग्रहण भी न रोक सका आस्था की अग्नि: घाघरला में बदली परंपरा, ‘प्रहलाद खोज’ के बाद गूंजा होलिका दहन का जयघोष

ग्रहण भी न रोक सका आस्था की अग्नि: घाघरला  में बदली परंपरा, ‘प्रहलाद खोज’ के बाद गूंजा होलिका दहन का जयघोष 
बुरहानपुर
रंगों के महापर्व होली पर इस वर्ष नेपानगर तहसील अंतर्गत ग्राम घाघरला में आस्था,परंपरा और सामूहिक एकता का अनुपम दृश्य देखने को मिला। बंजारा समाज की सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार यहां हर वर्ष ब्रह्म मुहूर्त—प्रातः 4 बजे—होलिका दहन किया जाता है। किंतु इस बार मंगलवार को लगे ग्रहण के कारण समाज ने आपसी सहमति से समय में परिवर्तन करते हुए शाम को ही विधि-विधान से होलिका दहन संपन्न किया।
बंजारा समाज की होली अपने अनूठे अंदाज़ और विशिष्ट परंपराओं के लिए जानी जाती है। मान्यता है कि होलिका दहन से पूर्व भक्त प्रह्लाद की प्रतीकात्मक ‘खोज’ की जाती है। इसी परंपरा के तहत समाजजन शाम से देर रात तक ‘प्रहलाद खोज’ की रस्म निभाते हैं। सामान्य वर्षों में यह अनुष्ठान तड़के ब्रह्म मुहूर्त में पूर्ण होता है, जिसे अत्यंत शुभ और सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण समय माना जाता है। विश्वास है कि इस बेला में अग्नि प्रज्वलित करने से वर्षभर घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है।
इस वर्ष ग्रहण के चलते शुभ कार्यों को टालने की परंपरा का सम्मान करते हुए ग्रामीणों ने सामूहिक निर्णय लिया कि होली दहन ग्रहण से पूर्व ही किया जाए। मंगलवार शाम वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ होलिका पूजन संपन्न हुआ। बड़ी संख्या में महिलाएं, पुरुष, बुजुर्ग और बच्चे उपस्थित रहे। सभी ने अग्नि की परिक्रमा कर परिवार, पशुधन और फसलों की समृद्धि की कामना की।
विशेष रूप से जिन घरों में छोटे बच्चे हैं, उन्हें होली माता के दर्शन कराए गए। समाज का विश्वास है कि इससे बच्चों को आशीर्वाद और सुरक्षा प्राप्त होती है। दहन के पश्चात महिलाओं ने पारंपरिक लोकगीत गाए, युवाओं ने सामाजिक नृत्य प्रस्तुत किए और मधुर भजनों के साथ फाग उत्सव मनाया गया। पूरे गांव में भक्ति, उत्साह और उल्लास का वातावरण छा गया।
होलिका दहन की पौराणिक कथा—भक्त प्रह्लाद की रक्षा और होलिका के दहन—को बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक मानते हुए ग्रामवासियों ने श्रद्धा के साथ त्योहार मनाया।
ग्रहण के कारण समय में बदलाव अवश्य हुआ, लेकिन आस्था की ज्योति पहले की तरह प्रज्वलित रही। ग्राम घाघरला की यह होली एक सशक्त संदेश दे गई—परिस्थितियां बदल सकती हैं, पर विश्वास और परंपरा की लौ कभी नहीं बुझती।

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